हिंदी पत्रकारिता का उद्भव एवं विकास | Origin and Development of Hindi Journalism

हिंदी पत्रकारिता का उद्भव एवं विकास |पत्रकारिता शब्द का सामान्य अर्थ है- पत्रकार का व्यवसाय या कार्य। हिन्दी में इसके लिए अनेक पर्यायवाची शब्द प्रचलित हैं पत्रकला, पत्रकार कला आदि। यद्यपि सम्पादनकला शब्द काफी दिनों तक पत्रकारिता के अर्थ में प्रयुक्त हुआ, किन्तु इन दो शब्दों में मूलभूत अन्तर है। सम्पादन का अर्थ तो व्यवस्थित करना, काटना, तराशना है, किसी विषय में गति देने को सम्पादन कह देते हैं। अर्थ संकोच के कारण रूढ़ अर्थ सम्पादकीय लेखन, टिप्पणी लेखन आदि के लिए कर लिया जाता है।

हिंदी पत्रकारिता का उद्भव एवं विकास | Origin and Development of Hindi Journalism

पत्रकारिता, एक व्यापक शब्द है। समय जैसे-जैसे परिवर्तित हुआ इसकी अर्थ व्याप्ति बढ़ी। शनैः शनैः पत्र पत्रिकाओं में समाचार प्रेषण, समाचार लेखन, समाचार पुनर्लेखन, मुद्रण, वितरण के तौर-तरीकों में परिवर्तन आए। वैज्ञानिक उन्नति ने तो इस कार्य क्षेत्र में चार चांद ही लगा दिए । फलस्वरूप पत्रकारिता का आयाम बढ़ा। पहले पत्रकारिता पत्र-पत्रिकाओं के लेखन तक सीमित थी, किन्तु विद्युतीय मीडिया रेडियो और दूरदर्शन दोनों ने पत्रकारिता का अर्थ और स्वरूप ही बदल डाला। नवीन संचार माध्यम- कम्प्यूटर पेपरलैस न्यूज पेपर, मल्टी मीडिया, इन्टरनेट तथा मल्टी चैनल्स ने पत्रकारिता के क्षेत्र में अपूर्व क्रान्ति ला दी है।

हिंदी पत्रकारिता के उद्भव एवं विकास पर प्रकाश डालिए

वैज्ञानिक, प्राविधिक या शैल्पिक विकास आधुनिक युग की देन है। रामकृष्ण रघुनाथ खाडिलकर के शब्दों में, “छपने वाले लेख- समाचार तैयार करना ही पत्रकारी नहीं रह गयी। आकर्षक शीर्षक देना, पृष्ठों का आकर्षक बनाव-ठनाव, जल्दी से जल्दी समाचार देने की होड़, देश-विदेश के प्रमुख उद्योग-धंधों के विज्ञापन प्राप्त करने की चतुराई, सुन्दर छपाई और पाठक के हाथ में सबसे जल्दी पत्र पहुंचा देने की त्वरा, ये सब पत्रकार कला के अन्तर्गत आ गये।

हिंदी पत्रकारिता का उद्भव एवं विकास | Origin and Development of Hindi Journalism
हिंदी पत्रकारिता का उद्भव एवं विकास | Origin and Development of Hindi Journalism

अंग्रेजी में पत्रकारिता के लिए Journalism (जर्नलिज्म) शब्द का प्रयोग किया जाता है। इसमें पत्रकारिता शब्द का पूर्ण अर्थ समुच्चय आ जाता है। अनेकानेक पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन बढ़ रहा है। सी.जी. मूलर की मान्यता है

“Journalism is the business of timely knowledge-the business of obtaining the necessary facts of obtaining them carefully and of presenting them fully and of acting them wisely.”

पत्रकारिता एक कला भी है और उद्योग भी। समाचार संग्रहण, समाचार सम्पादन, समाचार प्रस्तुतीकरण, सम्पादकीय लेखन, साज-सज्जा (डिजायन, मेकअप, ले-ऑउट) आदि चित्रमयता, विज्ञापन सभी कलात्मकता से परिपूर्ण हैं। सच तो यह है शीर्षक लेखन अत्यन्त दुष्कर है और समाचार पत्र नहीं, शीर्षक ही बिका करते हैं।

पत्रकारिता राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा अन्य क्षेत्रों में सूचना उपलब्ध कराती है। समाचारों के आरण्यक में से ज्वलन्त समसामयिक स्थितियों का तर्क सम्मत अध्ययन करती है, समाचारों के गहन गूढ़ सतहों के विश्लेषण करती है। पत्रकारिता समूचे समाज का दिशा निर्देशन करती है, मनोरंजन करती है, व्यक्ति और समाज का सम्यक विकास करती है। लोक-चेतना लाने में इसका विशेष योगदान रहता है।

पत्रकारिता समाज और सरकार के बीच सेतु का कार्य करती है। हिंदी पत्रकारिता का उद्भव एवं विकास, यही कारण है पत्रकारिता को लोकतान्त्रिक सरकारों में चौथे राज्य की संज्ञा मिली है। यह जनमत बनाने का अद्भुत यन्त्र है। अभिव्यक्ति का इतना सशक्त, सर्वोत्तम और सहज सुलभ माध्यम कोई नहीं। पत्रकारिता केवल समय की नब्ज पर ही ध्यान नहीं रखती। यह हमारी संस्कृति का संवाहिका भी है। किसी ने इसको ‘पांचवा वेद’ तो किसी ने ‘गतिमान संसद’ की संज्ञा दी।

स्वाधीनता आन्दोलन के युग में पत्रकारिता एक जनसेवा के रूप में उभरी, अत्यन्त कष्ट और यातनाएं सहकर पत्रकारों ने स्वाधीनता आन्दोलन को जीवित रखा। स्पष्ट तो यह हिन्दी पत्रकारिता का जन्म उच्च मानदण्डों को लेकर हुआ। आदर्श पत्रकारिता मानव मूल्यों, नैतिक मूल्यों, सामाजिक मूल्यों, सांस्कृतिक मूल्यों की संवाहिका रही जबकि पाश्चात्य देशों में पत्रकारिता का व्यवसायिक रूप उत्पन्न हुआ।

इंग्लैण्ड में मुद्रण सन् 1476 में प्रारम्भ हुआ वहां पहला समाचार पत्र न्यूज ऑउट ऑफ कैट सन् 1561 के आसपास छपा। अंग्रेजी पत्रकारों में बोर्न, आर्चर, बटर विख्यात है उन्होंने कोरांट, न्यूज फ्राम स्पेन वीकली न्यूज प्रकाशित किए।

भारत में पत्रकारिता का आरंभ या हिंदी पत्रकारिता का उदय

भारतवर्ष में जेम्स आगस्टस हिकी ने सन् 1780 में कलकत्ता में साप्ताहिक बंगाल गजट’ प्रारम्भ किया। इसमें सामाजिक बंगाल गजट प्रारम्भ किया। इसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विषय रहते थे। सन् 1780 में ही पीटर रीड ने ‘इंडियन गजट’ नामक पत्र प्रकाशित किया।

भारतीय भाषाओं में रचित प्रथम पत्रिका

भारतीय भाषाओं में सबसे पूर्व बंगला पत्र ‘दिग्दर्शन’ है। जे.पी. मार्शमन ने 1818 में इस मासिक-पत्र का प्रकाशन किया।

हिन्दी पत्रकारिता का बीजवपन होने से पूर्व नवजागरण के अग्रदूत राजा राम मोहनराय ने संवाद कौमुदी, मिरातुल अखबार प्रकाशित किये। मद्रास के गर्वनर सर टॉमस मुनरो का कथन था- “इनको प्रैस की आजादी देना हमारे लिए खतरानक है। विदेशी शासन और समाचार पत्रों की स्वतन्त्रता दोनों एक साथ नहीं चल सकते।” राजा राम मोहनराय ने सन 1830 में प्रेस स्वतन्त्रता बाधक नियमों के विरुद्ध आन्दोलन चलाया जो सफल रहा। हिन्दी पत्रकारिता से पूर्व अंग्रेजी, बंगाली, फारसी के पत्र प्रकाशित हो चुके थे।

हिन्दी पत्रकारिता के सूत्रधार युगल किशोर शुक्ल को माना जाता है। उन्होंने 30 मई सन् 1826 को उदन्तमार्तण्ड साप्ताहिक पत्र प्रकाशित किया।

“दिनकर कर प्रगटत दिनहि यह प्रकाश अठयाम, ऐसो रवि अब उग्यो महि जेहि-जेहि सुख को धाम। उत कमलानि विकसित करत बढ़त चाव चित वाम, लेत नाम या पत्र को होत हर्ष अर काम। “

अत्यन्त संघर्ष और जीवट से यह पत्र अपना ध्येय कार्य करता रहा। तत्कालीन शासकों को कोपभाजन बना, आर्थिक व अन्य कारणों से 4 सितम्बर, 1827 को काल कवलित हो गया। सम्पादक की अन्तर्वेदना अविस्मरणीय है|

“आज दिवस लौ उग चुक्यो मार्तण्ड उदन्त । अस्ताचल को जात है दिनकर दिन अब अन्त।”

हिंदी की प्रथम पत्रिका या हिंदी का समाचार पत्र (hindi patrakarita ka udbhav evam vikas)

स्वाधीनता आन्दोलन के समय बंगदूत, समाचार सुधावर्षण, पयामे आजादी प्रारम्भिक पत्र थे। अंकुरण काल में कलकत्ता समाचार पत्रों का मुख्य केन्द्र कहलाता था और अध्ययनों से पता चलता है कि उस युग में साप्ताहिक पत्रों का प्रचलन था। राजा राम मोहनराय ने सन् 1829 में बंगदूत का सम्पादन किया इसका लक्ष्य भारत की जनता का क्लेश मिटाना था।

“दूतनि की यह रीति बहुत थोरे मे भावै। लोगनि को बहुलाभ होय याही तै लाखै ।। बंगला को दूत दूत यदि वायु को जानौ। होय विदित सब देश क्लेश को लेशन मानो।।”

hindi patrakarita ke udbhav evam vikas par prakash daliye

इस पत्र की विशेषता यह है कि यह अंग्रेजी साम्राज्य की कूटनीति का पर्दाफाश कर भारतीय जनता में आक्रोश की लहर भरने में सफल रहा। इसी पत्र के सम्पादक ने भारतीय समाज को सामाजिक कुरीतियों अशिक्षा, बाल-विवाह, सती-प्रथा के प्रति सचेत किया। सन् 1854 में श्याम सुन्दर सेन के सम्पादन में पहला हिन्दी दैनिक पत्र समाचार सुधावर्षण प्रकाशित हुआ। इसकी सम्पादकीय टिप्पणियां, अग्रलेख अत्यन्त प्रभावात्मक थे। स्वाधीनता आन्दोलन में अहम् भूमिका निभाने वाले इस पत्र का ही प्रभाव था कि भारतीय जनता में गौरी चमड़ी वालों के प्रति विद्वेष और निजी जातीय स्वाभिमान जग चुका था।

अज्जीमुल्ला खां ने सन् 1857 में पयामे आजादी पत्र प्रकाशित किया। संजीव मानावत के अनुसार, “यह एक ऐसा शोला था जिसने अपनी प्रखर एवं तेजस्वी वाणी से जनता में स्वतन्त्रता का प्रदीप्त स्वर फूंका। अल्प समय तक निकलने वाले उस पत्र ने तत्कालीन वातावरण में ऐसी जलन पैदा कर दी जिससे ब्रिटिश शासक घबरा उठे तथा उन्होंने इस पत्र को बन्द कराने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। इसकी सारी प्रतियों को जब्त कराने को विशेष अभियान तत्कालीन सरकार ने चलाया फिर भी इस पत्र ने जन जागृति के क्षेत्र में सराहनीय योगदान दिया।

” इस पत्र में प्रकाशित राष्ट्रीय गीत की पंक्तियां द्रष्टव्य हैं “आया फिरंगी दूर से ऐसा मन्त्र मारा। लूटा दोनों हाथों से प्यारा वतन हमारा। (hindi patrakarita ka vikas)

आज शहीदों ने तुमको अहले वतन हमारा। तोड़ो गुलामी की जंजीरें बसाओं अंगारा।”

पयामे आजादी के प्रेरक वाक्यों ने भारतीयों में नयी उमंग उत्पन्न की जिससे आजादी प्राप्त करने का स्वप्न देखना प्रारम्भ किया जा सका। उस युग में प्रजा हितैषी, बुद्धि प्रकाश, मजरूहल सरूर ग्वालियर गजट, धर्म प्रकाश, ज्ञान प्रदायिनी पत्रिका वृत्तान्त विलास आदि पत्रों ने राष्ट्रीय भावना का सूत्रपात किया। सन् 1826-1867 का कालखण्ड प्रारम्भिक काल माना जाता है जिसमें हिन्दी पत्रों का कोई निश्चित स्वरूप नहीं था। इतना अवश्य है राष्ट्र संचेतना लाने और भाषा के प्रति सम्मोहन उत्पन्न करने का यह प्रथम प्रयास था। hindi patrakarita ka udbhav aur vikas

सन् 1868-1900 ई. तक कालखण्ड भारतेन्दु युग के नाम से अभिहित किया जाता है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र अत्यन्त प्रतिभावान व्यक्ति थे उन्होंने कवि वचन सुधा मासिक पत्रिका सम्पादन किया। डॉ. रामचन्द्र तिवारी के अनुसार, “भारतेन्दु का स्थान हिन्दी पत्रकारिता में अन्यतम है। उन्होंने हिन्दी के प्रत्येक अभाव को दूर करने की भरपूर चेष्टा की।” भारतेन्दु ने दो दर्जन से भी अधिक पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से किया। साहित्य मनीषी, आलोचक, पत्रकार, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र कविवचन सुधा, हरिश्चन्द्र मैगजीन, हरिश्चन्द्र चन्द्रिका, हिन्दी प्रदीप, भारत मित्र, आनन्द कादम्बिनी, ब्राह्मण पत्रों के प्रेरक थे।

उन्हें हिन्दी जगत् का मूर्धन्य निबन्धकार, पत्रकार माना जाता है। उनकी पत्रिका बाला बोधिनी (1874 ई.) नारी उत्थान की विशिष्टतम पत्रिका मानी जाती है। कविवचन सुधा अल्मोड़ा अखबार, हिन्दी दीप्ति प्रकाश, बिहार बन्धु, हिन्दी प्रदीप, भारत-मित्र, सारसुधा निधि, उचित वक्ता, ब्राह्मण, सुधानिधि, हिन्दोस्थानी, सर्वहितैषी, हिन्दी बंगवासी, साहित्य सुधा निधि उस काल के प्रमुख पत्र थे। युग के अन्तिम चरण में सरस्वती मासिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ हो चुका था।

आर्य मित्र (मासिक), भारतोदय (दैनिक), आर्याव्रत (साप्ताहिक) भी प्रकाशन में थे। उस युग के प्रमुख हिन्दी पत्रकारों में बालकृष्ण भट्ट, प्रताप नारायण मिश्र, राधा चरण गोस्वामी, प्रेमघन, अम्बिका दत्त व्यास आदि थे, उन्होंने हिन्दी पत्रकारिता को बहुआयामी बनाया। हिन्दी प्रदीप में माधव शुक्ल की रचना – “जरा सोचो तो यारो यह बम क्या है?” अत्यन्त प्रेरणादायक, जीवन कृति थी। बाला बोधिनी के सम्पादक भारतेन्दु नारी को अबला नहीं मानते थे। उन्होंने बालाबोधिनी के प्रथमांक में ही उद्घोष किया

“मैं, तुम लोगों में हिल-मिलकर सहेलियों और संगीनों की भांति रहना चाहती हूं। इससे मैं तुम लोगों से हाथ जोड़कर और आंचल खोलकर यही मांगती हूं कि मैं जो कभी भली-बुरी, कड़ी-नरम, कहनी, अनकहनी, कहूं उसे मुझे अपनी समझकर क्षमा करना, क्योंकि मैं जो कुछ कहूंगी सो तुम्हारे हित की कहूंगी।”

भारतेन्दु युगीन पत्रकारिता में साहित्यिकता है, इसमें युगीन चेतना या युगबोध है तथा समाजसुधारक प्रवृत्ति विद्यमान है।

सन् 1900 से 1920 तक कालखण्ड पल्लवन काल या द्विवेदी युग माना जाता है। उस युग तक राष्ट्र भक्ति का पर्याप्त वातावरण कायम हो चुका था। लोक चेतना आ चुकी थी कि जब तक राजनीतिक स्वतन्त्रता नहीं आयेगी सामाजिक उन्नति कुछ मायने नहीं रखती। सन् 1905 में बंग-भंग आन्दोलन ने सारे भारत को उन्मथित कर डाला। लाला लाजपतराय, बालगंगाधर तिलक, विपिनचन्द्र पाल ने स्वतन्त्रता की रणभेरी बजायी।

वीर सावरकर, आजाद भगतसिंह जैसे क्रान्तिकारियों ने मातृभूमि की रक्षा का बीड़ा उठाया। बाल गंगाधर तिलक ने सबसे पूर्व मराठी साप्ताहिक केसरी और अंग्रेजी साप्ताहिक मराठा का सम्पादन किया। सन् 1907 में नागपुर से इसका हिन्दी संस्करण हिन्दी केसरी माधवराव सप्रे ने प्रकाशित किया। उन्होंने अपने लेखों से जन क्रान्ति लाने का प्रयास किया। उनकी ओजस्वी वाणी से दूसरे पत्रों को भी प्रेरणा मिली। मराठा, हिन्दी केसरी के अतिरिक्त उस युग में शान्ति नारायण भटनागर का स्वराज्य, अम्बिका प्रसाद वाजपेयी का नरसिंह, यशोदानन्दन अखौरी का देवनागर महत्त्वपूर्ण प्रयोग करने वाले पत्र थे।

उस युग में शान्ति नारायण भटनागर के अतिरिक्त रामदास, होती लाल वर्मा, बाबू राम हरि, मुंशी राम सेवक, नन्द लाल चोपड़ा, लड्डा रामकपूर को सरकार ने विद्रोही पत्रकार मानकर दण्डित किया। स्वराज्य के सम्पादक पद का विज्ञापन अविस्मरणीय है- “चाहिए स्वराज्य के लिए एक सम्पादक वेतन दो सूखी रोटियां, एक गिलास ठण्डा पानी और हर सम्पादकीय के साथ दस साल की जेल ।

कालान्तर में महामना मदन मोहन मालवीय ने अभ्युदय का प्रकाशन किया। निर्भीकता राष्ट्रप्रेम और समाज सुधार के इस पत्र ने भगत सिंह की शहीदी पर फांसी अंक प्रकाशित कर क्रान्ति मचा दी। इसी से प्रेरित होकर लीडर नामक पत्र प्रकाशित हुआ। देवनागर नाम पत्र राष्ट्रीय एकता को महत्त्व देकर समूचे भारतीय समाज को एकनिष्ठ करने में जुटा रहा।

स्वतन्त्रता से पूर्व (सन् 1921 से 1947) सरस्वती, प्रभा, चांद, मा गुरी आदि पत्रिकाओं का प्रकाशन हो चुका था। ‘स्त्री दर्पण’ नारी जगत की अहम् पत्रिका थी जिसमें उनकी समस्याओं का निराकरण रहता था। मर्यादा, विशाल, भारत, हंस आदि विशेष महत्त्वपूर्ण थे। विशाल भारत के सम्पादन में बनारसीदास चतुर्वेदी व अज्ञेय थे। गांधी जी ने विचार पत्रों, नवजीवन, हरिजन, हरिजन सेवक, हरिजन बन्धु आदि पत्रों की रचना की। गणेश शंकर विद्यार्थी का पत्र प्रताप, माखनलाल चतुर्वेदी का कर्मवीर, दशरथ प्रसाद द्विवेदी का स्वदेश, बाबू शिव प्रसाद गुप्त का आज विशिष्ट महत्त्व रखने वाले पत्र थे।

श्री प्रकाश, बाबू राव विष्णुराव पराडकर, दिनेश दत्त झा, रामचन्द्र रघुनाथ खाण्डिलकर, मुकुट बिहारी वर्मा ‘आज’ में सम्पादकीय कर्म कौशल दिखाकर उत्कृष्ट कहलाये। लक्ष्मण नारायण गर्दे ने श्रीकृष्ण संदेश का सम्पादन किया। रणभेरी, शंखनाद, चिंगारी, रणडंका, तूफान उन नामी पत्रों में से हैं जिन्होंने स्वतन्त्रता आन्दोलन को और प्रखरता प्रदान की। इसी युग में ‘कल्याण जैसी मासिक पत्रिका का प्रकाशन हुआ जो भक्ति, ज्ञान, वैराग्य का सन्देश प्रसारित करती है। शिवपूजा सहाय का पत्र ‘जागरण’ सामयिक बोध का विशिष्टतम पत्र कहलाया। सन् 1947 में नवभारत, नयी दुनिया दैनिक पत्र प्रकाशित हुए। नवभारत अब नव भारत टाइम्स के नाम से जाना जाता है।

स्पष्टतः स्वतन्त्रता से पूर्व पत्र-पत्रिकाओं में राजनीतिक, सामाजिक विषयों पर निर्भीक वक्तव्य दिए गए। साहित्यिक पत्रिकाओं का प्रचलन भी बढ़ा, किन्तु नारी समुदाय की पत्र-पत्रिकाएं उस समय अधिक मात्रा में नहीं थी।

सन् 1947 में उपरान्त दैनिक पत्रों ने आशातीत प्रगति की है। दैनिक जागरण, दैनिक ट्रिब्यून, आज, भास्कर, अमर उजाला, अजीत समाचार, जनसत्ता, नई दुनियां, नवभारत टाइम्स आदि उल्लेखनीय पत्र हैं। पत्रिकाओं में सरिता, सारिका, वामा, फिल्म फेयर, माधुरी कादम्बिनी, सर्वोत्तम, सुरभि, आजकल, योजना आदि हैं। दिनमान, धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान अच्छे स्तर की पत्रिकाएं थीं।

इनमें सामयिक विषयों पर अच्छी चिन्तन सामग्री उपलब्ध रहती थी, परन्तु ये अब काल-कवलित हो चुकी हैं। ‘नन्दन’ बालोपयोगी पत्रिका का प्रकाशन हो रहा है। शोध के क्षेत्र में आलोचना, संभावना, परिशोध, माध्यम, परामर्श आदि महत्त्वपूर्ण पत्रिकाएं हैं जिनमें गवेषणात्मक लेख सुधी आलोचकों और विद्वजनों द्वारा प्रकाशित होते हैं।

साठोत्तर युग में लघु पत्रिकाओं का प्रचलन बढ़ा है। साहित्यिक कोटि की इन पत्रिकाओं में व्यावसायिकता की अपेक्षा वैचारिकता ही मूल लक्ष्य है। कल्पना, प्रतीक, माधुरी, नया समाज, अन्यथा ऐसी ही पत्रिकाएं हैं। साहित्यिक कोटि की इन पत्रिकाओं का विशेष भविष्य नहीं है, परन्तु फिर भी इनका प्रभाव रहता है। कतिपय सफल मानी जाने वाली लघु पत्रिकाओं में पहल, वर्तमान, साहित्य, पल प्रतिपल, फिर, विकल्प, कथाबिम्ब, कथा, कथन, तद्भव, दस्तक, दस्तावेज, नयापथ आदि हैं।

मुद्रण और कला के क्षेत्र में कंप्यूटर आ जाने से पत्र-पत्रिकाओं के मुद्रण, साजसज्जा और सम्पादन में मानो कलात्मकता सी आ गयी है। ग्रामीण या विकास पत्रकारिता, बाल-पत्रकारिता, खेल-पत्रकारिता, विज्ञान पत्रकारिता, आर्थिक पत्रकारिता, टेलीविजन पत्रकारिता, रेडियो पत्रकारिता, फोटो पत्रकारिता, खोजी पत्रकारिता के क्षेत्रों में पहले की अपेक्षा परिवर्तन आया है और सभी उन्नति पथ पर अग्रसर हैं। आज साहित्य, संस्कृति, धर्म, शिक्षा, खेलकूद, बैंकिंग, कानून, कृषि, स्वास्थ्य, विज्ञान, उद्योग आदि क्षेत्रों में अपनी-अपनी पत्रिकाएं उपलब्ध हैं। महिला जगत की पत्रिकाओं में गृहशोभा, वनिता, सरोपमा आदि हैं। इन

नारी-पत्रिकाओं के कलेवर में आकर्षण तो है. सूचना प्रदान करने की क्षमता भी है, किन्तु ये ईमानदारी से अपना दायित्व बोध पूरा नहीं कर पाती; क्योंकि ये व्यावसायिकता के पीछे भाग रही हैं।

सारांश में, कहा जा सकता है कि हिन्दी पत्रकारिता ने संघर्षशीलता की एक लम्बी कठिन पगडण्डी तय की है उसने राष्ट्रीय उद्बोधन, राष्ट्र उत्थान को महत्त्व दिया। जनमत बनाने में अहम् भूमिका निभायी, किन्तु स्वतन्त्रता के उपरांत हिन्दी पत्रकारिता अपने आदर्शों, मानदण्डों की अपेक्षा अंग्रेजी पत्रकारिता की तरह उद्यमशीलता, प्रतिस्पर्धात्मक रुचियों से जुड़ी। प्रसार संख्या बढ़ाने के निमित्त, विज्ञापन जुटाने की लालसा ने पत्रकारिता को बाज़ारवाद की ओर उन्मुख किया। अनेक राजनीतिक, आर्थिक दबावों के बीच भी हिन्दी पत्रकारिता अपने-अपने क्षेत्रों में निर्भीकता, निष्पक्ष, बेलाग अभिव्यक्ति को स्थान दे रही है।

वह त्वरित गति से देश-विदेश के समाचार देने, उनकी मीमांसा करने, सामयिक ज्वलन्त विषयों पर लेखनी चलाने में पीछे नहीं हटती। खेमेबाजी, गुटबन्दी, क्षेत्रीय, जातीय सम्मोहन, आर्थिक लिप्साओं के कारण पीत पत्रकारिता भी हो रही है पर कहीं न कहीं भ्रष्टाचार के तिमिराच्छादित वातावरण में निःस्वार्थ लालसा से कम दीप्त ही सही आलोक-सा दिख पड़ रहा है।

हिन्दी पत्रकारिता का उदय कब हुआ विस्तार से समझाइए?

हिन्दी पत्रकारिता के सूत्रधार युगल किशोर शुक्ल को माना जाता है। उन्होंने 30 मई सन् 1826 को उदन्तमार्तण्ड साप्ताहिक पत्र प्रकाशित किया।

भारत में पत्रकारिता का उदय कब हुआ विस्तार से समझाइए?

भारतवर्ष में जेम्स आगस्टस हिकी ने सन् 1780 में कलकत्ता में साप्ताहिक बंगाल गजट’ प्रारम्भ किया। इसमें सामाजिक बंगाल गजट प्रारम्भ किया। इसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विषय रहते थे। सन् 1780 में ही पीटर रीड ने ‘इंडियन गजट’ नामक पत्र प्रकाशित किया।

भारत में अखबारी पत्रकारिता की शुरुआत कब हुई?

स्वाधीनता आन्दोलन के समय बंगदूत, समाचार सुधावर्षण, पयामे आजादी प्रारम्भिक पत्र थे। अंकुरण काल में कलकत्ता समाचार पत्रों का मुख्य केन्द्र कहलाता था और अध्ययनों से पता चलता है कि उस युग में साप्ताहिक पत्रों का प्रचलन था। राजा राम मोहनराय ने सन् 1829 में बंगदूत का सम्पादन किया इसका लक्ष्य भारत की जनता का क्लेश मिटाना था।

दुनिया में अखबारी पत्रकारिता को आए लगभग कितने साल हो गए?

इंग्लैण्ड में मुद्रण सन् 1476 में प्रारम्भ हुआ वहां पहला समाचार पत्र न्यूज ऑउट ऑफ कैट सन् 1561 के आसपास छपा। अंग्रेजी पत्रकारों में बोर्न, आर्चर, बटर विख्यात है उन्होंने कोरांट, न्यूज फ्राम स्पेन वीकली न्यूज प्रकाशित किए। दुनिया में अखबारी पत्रकारिता को आए लगभग 460 साल हो गए|

हिंदी में नेट पत्रकारिता का आरंभ कब से हुआ?

हिंदी में नेट पत्रकारिता के आरंभ के सूत्रधार युगल किशोर शुक्ल को माना जाता है। उन्होंने 30 मई सन् 1826 को उदन्तमार्तण्ड साप्ताहिक पत्र प्रकाशित किया।

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