पत्रकारिता का राजनीति, साहित्य, समाज और संस्कृति से क्या सम्बन्ध है

पत्रकारिता का राजनीति, साहित्य, समाज और संस्कृति से क्या सम्बन्ध है? | What is the relation of journalism with politics, literature, society, and culture?

पत्रकारिता का राजनीति, साहित्य, समाज और संस्कृति से क्या सम्बन्ध है? राजनीति हमारे राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है। इसका सार्वजनिक रूप से व्यापक प्रभाव है। आधुनिक युग में राजनीति को एक बला और राजनीतिज्ञों को प्रबल जन्तु माना जाता है जिसकी उपेक्षा न तो समाज कर सकता है और न ही पत्रकार इसीलिए पत्र-पत्रिकाओं में उसे प्रमुख स्थान प्राप्त है।

पत्रकारिता और राजनीतिक में क्या सम्बन्ध है?

पत्रकार केवल राजनीतिक समस्याओं को प्रस्तुत ही नहीं करते हैं बल्कि उनकी व्याख्या और उन पर टिप्पणी भी प्रस्तुत करते हैं, ताकि किसी विशेष समस्या पर जनमत निर्माण कर सकें। इस कार्य के लिए समाचार पत्र कहीं सत्ताधारियों के वक्तव्य छापते हैं, तो कहीं विपक्ष के आन्दोलन और आरोप समाचार-पत्र के किसी भी पृष्ठ को खोजकर देख लें | पत्रकारिता कितने प्रकार की होती है?

अधिकांश स्तम्भ राजनीति, राजनीतिज्ञों और राजनीतिक समस्याओं को समर्पित होते हैं। कहीं किसी रैली का वर्णन है तो कहीं किसी राष्ट्रीय नेता का। कहीं किसी का कोई चित्र छपा है तो कहीं कोई कार्टून। इस प्रकार पत्र-पत्रिकाएं राजनीति को अधिक महत्त्व देते हैं।

पत्रकारिता का राजनीति, साहित्य, समाज और संस्कृति से क्या सम्बन्ध है?
पत्रकारिता का राजनीति, साहित्य, समाज और संस्कृति से क्या सम्बन्ध है?

जनसाधारण दूसरे क्षेत्रों के विषय में भी जानना चाहता है, परन्तु राजनीतिज्ञों की बातें सुनने व उनकी चर्चा-परिचर्चा में ही उनका मन अधिक रमता है। कृषि, वन, नाटक, सिनेमा, खेल तथा वाणिज्य के उपरान्त उनका ध्यान एकदम राजनीति की ओर लौट आता है। पत्रकार भी मानव रुचि को ध्यान में रखकर ही राजनीति से जुड़े समाचारों को प्रमुखता से प्रकाशित करते हैं। इसलिए तो सजीव और रोचक भाषा में राजनीतिज्ञों के छोटे-छोटे कृत्यों को आकर्षक शीर्षक लगाकर प्रकाशित करते हैं।

पत्रकारिता और साहित्य में क्या सम्बन्ध है?

पत्रकारिता और साहित्य दोनों का क्षेत्र अलग-अलग है, परन्तु फिर भी ये एक दूसरे के निकट भी है। पीत पत्रकारिता क्या है? और साहित्य शब्द में जिस प्रकार हित का भाव निहित है उसी प्रकार पत्रकारिता में भी लोक हित रहता है। साहित्यकार समाज में जो कुछ देखता है, अनुभव करता है उसे अपनी रचना में व्यक्त कर देता है, इसको ही साहित्यिक पत्रकारिता का महत्व कहा जाता है; जबकि पत्रकार भी समाज के अनुभवों को समाचार के रूप में समाचार-पत्र में व्यक्त करता है |

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साहित्यिक पत्रकारिता क्या है

इन अनुभवों को साहित्यकार वर्षों पश्चात् भी व्यक्त कर देता है, परन्तु पत्रकार को उसे तत्काल व्यक्त करना होता है अन्यथा उसका समाचार बासी या ‘Dead’ हो जाता है और अगले दिन उसका मूल्य नहीं रहता। साहित्यिक पत्रकारिता का अर्थ इस प्रकार होता है की पत्रकारिता व साहित्य में अभिन्नता होने के साथ-साथ मूलभूत भेद भी है। कहा जाता है कि पत्रकारिता भी एक प्रकार का साहित्य है, परन्तु शीघ्रता में लिखा गया- “Journalism is a literature but in a hurry. सामान्य पाठक इस शीघ्रता में लिखे गए साहित्य व सुविचारित साहित्य के बीच भेद नहीं कर पाता। पत्रकार किसी घटना को समाचार के रूप में ढालता है तो वही घटना साहित्यकार के लिए साहित्य सृजन का आधार होती है।

समाचार पत्र और पत्रिकाओं का जीवन अस्थायी होता है जो समाचार-पत्र आज सुर्खियों में है, हो सकता है दो दिन बाद वह मूल्य खो बैठे। जैसे कि चुनावी वातावरण में चुनावों का सफल परिणाम आते ही पत्रकारों को पूर्वानुमान, निष्कर्ष, मूल्यांकन आदि समाप्त हो जाते हैं, परन्तु प्रसाद कृत ‘कामायानी का मूल्य तब भी था आज भी है और हमेशा बना रहेगा। इस प्रकार साहित्य सार्वकालिक कालजयी है तथा उसका मूल्य स्थायी होता है। समाचार का महत्त्व किसी एक स्थान या देश के लोगों के लिए अधिक हो सकता है, परन्तु साहित्य का महत्त्व देश-विदेश की सीमाओं को पार कर जाता है जैसे कि सैंकड़ों वर्ष बीत जाने के बाद भी कालिदास साहित्य विश्व विख्यात हैं।

परन्तु एक बात स्पष्ट है कि साहित्य वही लोग पढ़ते हैं जो अत्यन्त पढ़े-लिखे हैं। समाचार-पत्र और पत्रिकाएं सभी साक्षरों के लिए हैं। समाचार बड़ी तेजी से दूसरे देशों तक पहुंच जाते हैं, परन्तु साहित्य को पहुंचने में समय लगता है। इस प्रकार साहित्य और पत्रकारिता में जहां अनेक समानताएं है, वही असमानताएं भी है, परन्तु लक्ष्य दोनों का एक ही है और वह है लोकहित |

पत्रकारिता और समाज में क्या सम्बन्ध है?

व्यक्तियों का समूह समाज कहलाता है। विभिन्न जातियाँ, धर्म, वर्ग आदि मिलकर इसका निर्माण करते हैं। पत्रकार भी इसी समाज में रहता है वह लोगों के कष्टों व कठिनाइयों को देखता है और अनुभव करता है। दिन-प्रतिदिन की घटनाएं उसे प्रभावित करती है। लोक हित के लिए वह अनुभवों और दैनिन्दन घटनाओं को समाचार के रूप में प्रकाशित करता है।

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समाचार पत्र या पत्रिका किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं होते अपितु पूरे समाज के लिए होते हैं। समाचार-पत्र समय को बिताने, मनोरंजन करने, ज्ञानवर्द्धन करने का साधन है। व्यापारी उससे व्यापार के लिए बाजार भाव बनाना चाहता है तो खिलाड़ी खेलकूद सम्बन्धी जानकारी चाहता है। कोई विज्ञापन व सुन्दर चित्र देखना चाहता है।

सत्ताधारियों व विपक्ष को समर्थन, भाषणों की रिपोर्टिंग, स्त्रियों के लिए घर-गृहस्थी के सामान, नए आभूषणों, बच्चों के लिए आइसक्रीम व चॉकलेट आदि के नाम समाचार-पत्र में ही आते हैं। समाचार अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति इन पत्र-पत्रिकाओं से करता है। स्वास्थ्य, सौन्दर्य, प्रेम, विनोद, कला, विज्ञान, साहित्य, दर्शन, धर्म, व्यवसाय, व्यापार, खेलकूद राजनीति आदि अनेक सामाजिक विषयों पर लेख प्रकाशित होते हैं। समाचार-पत्र उनकी इन मांगों को के साथ-साथ उनके हित का भी ध्यान रखते हैं। पूरा करने करने

पत्रकार यहीं तक सीमित नहीं रहता अपितु उससे भी आगे बढ़ता है। वह समाज में हो रहे, शोषण और दमन, अन्याय और अत्याचार का भी पर्दाफाश करता है। वह स्वस्थ समाज का निर्माण चाहता है। पत्रकार का समाज के प्रति यह दायित्व और भावना पत्रकारिता स्पष्ट करती प्रतीत होती है। स्पष्ट यह है कि पत्रकार समाज के लिए है और समाज पत्रकार के लिए। इन दोनों को जोड़ने वाली पत्रकारिता है।

पत्रकारिता और संस्कृति में क्या सम्बन्ध है?

सम्पूर्ण समाज में होने वाली घटनाओं के समाचार पत्रकार देता है। इस समाचार पत्र के अन्तर्गत समाज की संस्कृति के भी दर्शन होते हैं। संस्कृति के अन्तर्गत उत्सवों, पर्वो, त्योहारों आदि के बारे में लेखादि समाचार पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। ये भारत की संस्कृति के विभिन्न आयामों को प्रस्तुत करते हैं। कई समाचार पत्रों में तो सांस्कृतिक संवाददाता के नाम से अलग संवाददाता भी होते हैं।

पत्र-पत्रिकाएं केवल भारतीय संस्कृति पर ही नहीं बल्कि पश्चिमी संस्कृति पर भी समाचार और चित्र प्रकाशित करती है ताकि भारतीय समाज भी उनसे परिचित हो। इस प्रकार पत्रकारिता का राजनीति की भांति संस्कृति से भी गहरे सम्बन्ध हैं। पत्रकार इसे अनदेखा करके पत्र नहीं चला सकते।

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