पत्रकारिता के प्रकार कितने हैं ? | What are the types of journalism?

पत्रकारिता के प्रकार (hindi patrakarita ke prakar) कितने हैं ? पत्रकारिता का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है। जीवन और जगत में जितने भी क्षेत्र बढ़े हैं, उतने ही पत्रकारिता में विविधता आयी है। आजकल पत्रकारिता के व्यवसाय का चयन करने वाला व्यक्ति अपनी योग्यता, अभिरुचि के अनुरूप विषय का चयन कर सकता है। इस तरह वह पत्रकारिता की सेवा कर समाज का मार्ग दर्शन कर सकता है।

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1 वास्तव में पत्रकारिता का उद्देश्य व्यक्ति का सर्वांगीण विकास करना है। पत्रकारिता के कई प्रकार हैं उनमें कुछ इस तरह हैं | Patrakarita ke prakar

वास्तव में पत्रकारिता का उद्देश्य व्यक्ति का सर्वांगीण विकास करना है। पत्रकारिता के कई प्रकार हैं उनमें कुछ इस तरह हैं | Patrakarita ke prakar

अक्सर लोग सवाल करते है की पत्रकारिता के प्रकार का वर्णन कीजिए | आज हम वही जानगे |

  • खोजी पत्रकारिता
  • आर्थिक पत्रकारिता
  • विकासात्मक पत्रकारिता
  • व्याख्यात्मक पत्रकारिता
  • क्रीड़ा पत्रकारिता
  • फोटो पत्रकारिता
  • फिल्म पत्रकारिता
  • संसदीय पत्रकारिता
  • रेडियो, टी.वी. (दूरदर्शन) पत्रकारिता
  • ग्रामीण (जिला) पत्रकारिता
  • विधि पत्रकारिता
  • संदर्भ पत्रकारिता
  • बाल पत्रकारिता
  • साहित्यिक पत्रकारिता
  • वाणिज्यिक पत्रकारिता
  • शैक्षिक पत्रकारिता
  • पर्यावरण पत्रकारिता
  • धार्मिक पत्रकारिता
  • अन्तरिक्ष पत्रकारिता
  • स्वास्थ्य पत्रकारिता
  • महिला पत्रकारिता
पत्रकारिता के प्रकार कितने हैं? | What are the types of journalism?
पत्रकारिता के प्रकार कितने हैं? | What are the types of journalism?

खोजी पत्रकारिता :

यों तो प्रत्येक पत्रकार खोजी प्रवृत्ति का व्यक्ति होता है। गवेषणा,, अनुसंधानात्मकता, खोजबीन उसकी प्रवृत्ति है, परन्तु अपने प्राणों का उत्सर्ग कर सत्य का अन्वेषण करना खोजी पत्रकारिता है। आधुनिक युग में राजनीति और अपराध जगत ने भ्रष्टाचार द्वारा पत्रकारिता को पीत बना दिया है वहां खोजी पत्रकार निरन्तर संधान में जुटा रहता है। वह समसामयिक विषयों, गतिविधियों पर सूक्ष्म दृष्टि रखता है। वह निर्भीकता का परिचय देता है, सपाटब्यानी करता है। आज हम जानेगे की पत्रकारिता के पहलू कौन-कौन से हैं

खोजी पत्रकारिता पटाक्षेप करने में विश्वास रखती है अर्थात् गुह्य या अप्रत्यक्ष को प्रत्यक्ष व गोचर बनाना ही इसका लक्ष्य है। खोजी पत्रकार अपनी बात को विश्वसनीय बनाने के लिए दस्तावेज जुटाता है, सम्बन्धित चित्रों का संकलन करता है। इस पत्रकारिता का उद्देश्य सार्वजनिक हित या राष्ट्रीय हित होता है।

खोजी पत्रकारिता एक चुनौतीपूर्ण एवं जोखिमभरा कार्य है इससे भ्रष्टाचार उन्मूलन किया जा सकता है, परन्तु कतिपय पत्रकार अपने निजी स्वार्थों के लिए पीत पत्रकारिता’ करते हैं, वे कुछ छापने या कुछ न छापने की एवज में जेब गर्म करते हैं। वास्तव में किसी व्यक्ति या संस्था की मानहानि करना पत्रकारिता नहीं। जब तक यह सार्वजनिक हित में आवश्यक न हो ऐसा नहीं करना चाहिए।

खोजी पत्रकारिता तथ्यान्वेषण पर आधारित है। खोजी पत्रकार संदर्भों की सतह तक जाने का प्रयास करता है तथ्यों का अध्ययन, अनुशीलन करता है, प्रमाण सहित निष्कर्ष जुटाता है। अपराध की दुनिया में बड़े चातुर्य से तथ्यों को छिपाने का प्रयास होता है। बड़े-बड़े घोटालों का अनावृत्त करने के लिए खोजी पत्रकारों को जासूसी जैसा काम करना पड़ता है।

आर्थिक पत्रकारिता :

व्यक्ति और राष्ट्र की समृद्धि का आधार आर्थिक ढांचा होता है। पैसे के बिना जीवन और जगत का कोई कार्य नहीं हो पाता। धन या आर्थिक तन्त्र सम्बन्धी पत्रकारिता आर्थिक पत्रकारिता कहलाती है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में काफी लेख मुद्रा सम्बन्धी होते हैं, जैसे उत्पादन, उद्योग, शेयर बाजार, स्टॉक मार्केट, राष्ट्रीय आय, बजट आदि। कुछ पत्र-पत्रिकाएं ऐसी हैं जो इन्हीं विषयों का ही सूत्रपात करती है अर्थात् आर्थिक जगत् सम्बन्धी होती है। इकनोमिक्स टाइम्स, व्यापार भारती, विनियोजन आदि इस प्रकार की पत्रकारिता करते हैं। इन द्वारा व्यक्ति और राष्ट्र की आर्थिक क्षमता को बढ़ाने की चेष्टा की जाती है।

विकास पत्रकारिता :

आधुनिक युग विकास का युग है। विकास के विविध सोपानों से आम जनता को परिचित करना पत्रकारिता का दायित्व है। पत्रकारिता सामाजिक, आर्थिक, वैज्ञानिक प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में होने वाली विकास प्रक्रिया का अध्ययन करती है। विकास पत्रकारिता विकासात्मक योजनाओं पर दृष्टिपात करती है उनके क्रियान्वन का मूल्यांकन करती है। केन्द्रीय व राज्य सरकारों की नीतियों, योजनाओं और गतिविधियों की आलोचना करती है।

व्याख्यात्मक पत्रकारिता :

आधुनिक युग में रिपोर्टर या संवाददाता का कार्य केवल समाचारों का संकलन और लेखन नहीं है। समाचारों को हर दृष्टि से पूर्ण करने के लिए व्याख्या की आवश्यकता पड़ती है। किसी जमाने में जब संचार के साधन अपर्याप्त थे, मुद्रण और तथ्यात्मक संकलन के लिए वीडियो आदि की व्यवस्था नहीं थी उस समय संवाददाता द्वारा भेजा गया समाचार प्रकाशित कर कार्य की इतिश्री मान ली जाती थी, परन्तु अब समाज में साक्षरता है, जागरूकता है और समाचार की व्याख्या, तथ्यों को समझाने के लिए अवश्यकता प्रतीत होती है।

इस दिशा में समाचार समितियां विशेष भागीदारी कर रही हैं। व्याख्यात्मक पत्रकारिता की सामग्री फीचरनुमा होती है। यूनीवार्ता, प्रेसट्रस्ट ऑफ इण्डिया, हिन्दुस्तान समाचार, समाचार भारती ऐसी ही समाचार समितियां हैं जो समाचार जुटाने के साथ-साथ समाचार की व्याख्या करती हैं। तथ्यों के संग्रहण के साथ-साथ घटनाओं की पृष्ठभूमि भी जानना चाहती हैं।

क्रीड़ा पत्रकारिता :

सभी प्रमुख तथा राष्ट्रीय स्तरों के पत्रों में क्रीड़ा जगत सम्बन्धी सामग्री के लिए एक पृष्ठ निर्धारित रहता है। क्रीड़ा सम्बन्धी अभिरुचि को प्रोत्साहित करने के लिए कुछ खेल जगत की पत्रिकाएं भी हैं, जैसे क्रिकेट सम्राट, स्पोर्टस वीकली, खेल-खिलाड़ी आदि । खेल पत्रिकारिता का मुख्य उद्देश्य तो खेल समाचार उपलब्ध कराना तथा क्रीड़ा समाचारों का विश्लेषण करना है। क्रीडा पत्रकारिता करने वाले पत्रकार को क्रीड़ा जगत का सम्यक ज्ञान होना जरूरी है। उसे समाचारों के साथ-साथ क्रीड़ा जगत के बारे में लेख आदि भी देने होते हैं। क्रीड़ा पत्रकार को क्रीड़ा जगत की पारिभाषिक शब्दावाली का भी ज्ञान होना आपेक्षित है।

फोटो पत्रकारिता :

फोटो या चित्रों से समाचार पत्र पत्रिकाओं में मानों जान आ जाती है। स्पष्ट-सी बात है कि फोटो पत्रकार बनने के लिए फोटो खींचने की कला आनी चाहिए। एक अच्छा छायाकार या फोटोग्राफर स्थूल चित्र नहीं खींचता उसमें विद्यमान गत्यात्मकता, जीवंतता, अनुभूति और तथ्यात्मकता को सहेजता है। कई समाचारों को ज्यादा सनसनी खेज तथा प्रामाणिक बनाने के लिए फोटो की आवश्यकता पड़ती है।

इसके अतिरिक्त फीचर, लेख तथा अन्य समाचारेतर सामग्री को सजाने के लिए (मेकअप हेतु) फोटो की जरूरत महसूस की जाती है। हर राष्ट्रीय स्तर के पत्र-पत्रिका कार्यालय में छायाकारों का एक दल नियुक्त होता है। फोटो या छायाचित्रों की अपरिहार्य गुणवत्ता को देखकर ही फोटो पत्रकारिता जैसे क्षेत्र का महत्त्व स्वीकारा गया। फोटोग्राफी के क्षेत्र में भी दक्षता, अभिरुचि, कार्य के प्रति सचेतना हो तो फोटो पत्रकार बनने का स्वप्न पूरा हो सकता है।

ऐतिहासिक महत्त्व के समाचारों के साथ चित्र देना अब जरूरी माना जाता है। व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा के चलते अखबारों में फोटो छापने की जो होड़ लगी उससे भी फोटो पत्रकारिता की आवश्यकता बनी है। सच तो यह है आज फोटो पत्रकारिता पत्रकारिता का अहम् अवयव है। एक सफल छायाकार वही है जो फोटो सेंसिबिलटी रखता है और जीवन्त फोटो प्रस्तुत करने में सिद्धहस्त है वह फोटो के शीर्षक देने में भी अपने व्यक्तित्व की गहरी छाप छोड़ता है।

फिल्म पत्रकारिता :

आधुनिक युग में चित्रपट से जुड़ी पत्रकारिता का महत्त्व भी नकारा नहीं जा सकता। सिने जगत की गतिविधियों को पत्रकार के नजरिए से देखने का प्रयास करना ही फिल्म पत्रकारिता है। फिल्म जगत सम्बन्धी पत्र-पत्रिकाओं में नई फिल्मों की सम्यक् जानकारी फिल्मी जगत के समाचार, फिल्मों की समीक्षा, फिल्म निर्देशन और निर्माण सम्बन्धी जानकारियां, फिल्मी हस्तियों के साक्षात्कार व पुरस्कार आदि की जानकारी प्रस्तुत करना ही फिल्म पत्रकारिता है।

फिल्मी कलियां, फिल्म फेयर, फिल्मी दुनियां, मायापुरी, स्टारडस्ट, सुषमा, मूवी जगत आदि ऐसी ही पत्रिकाएं हैं जिनमें उपर्युक्त सामग्री भरपूर मात्रा में उपलब्ध रहती है। समाचार पत्रों में भी परिशिष्ट के रूप में फिल्मी जगत की हलचलें प्रकाशित की जाती हैं। लोग ऐसी रोचक, सरसतापूर्ण सामग्री को चाव से पढ़ते हैं। फिल्मी दुनियां के चित्र ऐसी सामग्री में चार-चांद लगा देते हैं।

संसदीय पत्रकारिता :

पत्रकार संसद में होने वाली कार्यवाहियों का प्रतिवेदन संसदीय समाचार के रूप में प्रकाशित करते हैं। पत्र-पत्रिकाओं में संसदीय समाचारों के अतिरिक्त संसद सम्बन्धी विषयों पर लेख प्रकाशित होते हैं। राज्य की विधानमण्डलों की भी इसी तरह रिर्पोटिंग की जाती है। संसद सम्बन्धी समाचारदाता को संसद व विधान मण्डलों की सारी कार्य प्रणाली का ज्ञान होना चाहिए।

संसदीय पत्रकारिता करने वाले पत्रकार को इस बात का ध्यान रखना पड़ता है कि वाक स्वातन्त्र्य के कारण संसद की अवमानना न हो। उसे बजट पास होने की प्रक्रिया, सामान्य या वित्त विधेयक बनाने की प्रक्रिया, शून्य काल, प्रश्नकाल की रिपोर्टिंग का पूरा ज्ञान होना आवश्यक है।

रेडियो व टी.वी. (दूरदर्शन) पत्रकारिता :

आकाशवाणी और दूरदर्शन जनसंचार के सशक्त माध्यम हैं ।। इनके लिए लेखन कार्य प्रिंट मीडिया के लेखन जैसा नहीं होता। वास्तव में रेडियो समाचार संकलन, समाचार लेखन के लिए श्रव्यात्मकता और टी वी. के लिए श्रव्य दृश्यात्मकता का ध्यान रखना पड़ता है। रेडियो पर आंखो देखा हाल, फीचर ऐसे ढंग से प्रस्तुत किए जाते हैं कि शब्द व ध्वनि प्रयोग से ही बोधगम्यता आ जाती है। नाटक और रेडियो में विशेष अन्तर ध्वन्यात्मकता का है।

मंचीय नाटक में पात्रानुकूल अभिनय का महत्त्व है जबकि रेडियो नाटक में कथोपकथन व ध्वनि संकेतों से सजीवता आ पाती है। दूरदर्शन का सीधा सम्बन्ध वीडियो रिकार्डिंग से जुड़ा है अर्थात् किन दृश्यों से तथ्यात्मक बोध लाया जा सकता है, प्रभावात्मकता पायी जा सकती है इसका ज्ञान टी.वी. रिपोर्टर को होना नितान्त आवश्यक है |

ग्रामीण (जिला) पत्रकारिता:

स्थानीय रंगत लिए जनजीवन की झांकी, समाचार प्रदान करने में ग्रामीण या जिला स्तर की पत्रकारिता का विशेष महत्त्व है। ग्रामीण पत्रकारिता में ग्रामीण समाज की समस्यामूलक स्थितियों घटनाओं का आंकलन करने का प्रयास होता है।

विधि पत्रकारिता:

पत्रकारिता को विधि पत्रकारिता से अलग नहीं किया जा सकता। पत्रकारिता एक वटवृक्ष है और विधि पत्रकारिता उसी की एक शाखा । पत्रकारों को दायित्व पूरा करने के विधि सम्मत नियम अधिनियम का पूरा ध्यान रखना पड़ता है। समाचार-पत्र समाज का सजग प्रहरी है इस नाते वह हर व्यक्ति को कानूनों की जानकारी देना चाहता है। इस कार्य को सम्पन्न करने के लिए विधि पत्रकारिता की आवश्यकता पड़ती

सन् 1968 में केन्द्रीय सरकार ने विधि पत्रिका का सर्वप्रथम प्रकाशन किया। यह निर्णय पत्रिका विभिन्न अदालती मामलों की अदालती कार्यवाहियों की जानकारी देने में सक्षम है। विधि सम्बन्धी पत्र-पत्रिकाओं में छोटी अदालतों, उच्च व उच्चतम न्यायालयों के निर्णयों की जानकारी होती है। न्यायाधीशों, न्यायपीठ सम्बन्धी समाचार होते हैं। विधि सम्बन्धी विषयों की कानूनी व्याख्या होती है। विधि रिपोर्टर को कानूनों की पूरी जानकारी होनी चाहिए। उसे ईमानदारी सत्यता और बिना किसी पूर्वाग्रह के अपनी बात कहनी चाहिए।

संदर्भ पत्रकारिता:

पत्रकारिता का एक विशेष क्षेत्र संदर्भ (Reference) जुटाने का भी है। पत्रकारों को अपनी सामग्री को प्रामाणिक तथ्यात्मक प्रभावपूर्ण या असरदार बनाने के लिए सन्दर्भों की आवश्यकता पड़ती है। यदि सम्पादकीय विभाग पत्र प्रतिष्ठान का मस्तिष्क है तो संदर्भ पत्रकारिता विभाग उस मस्तिष्क का स्मृति कोष है। स्पष्ट यह है कि किसी पत्रकारिता सम्बन्धी सामग्री को अधिक सारग्राही बनाने के लिए कतरनों, चित्रों, सन्दर्भ ग्रन्थों सरकारी रिपोर्टों, सम्बन्धित चित्रों, समाज, कला, संस्कृति, साहित्य विज्ञान, इतिहास, राजनीति, अर्थशास्त्र आदि सम्बन्धी पुस्तकों की आवश्यकता पड़ती है।

कई ऐसे समाचार होते हैं जिनको संदर्भ के बिना समझना नितान्त कठिन होता है। प्राकृतिक आपदा, राजनीतिक घटना, सैन्य गतिविधियों, पुरातत्त्व व अनुसंधान सम्बन्धी विषयों, ऐतिहासिक व धार्मिक स्थलों, विशिष्ट व्यक्तियों सम्बन्धी जानकारियां जुटाने के लिए संदर्भ पत्रकारिता की जरूरत होती है। हू इज हू ऐसा संदर्भग्रन्थ है जिससे किसी व्यक्ति व्यक्ति के पुरस्कृत होने, निधन होने व अन्य कार्यों का विवरण पाया जा सकता है।

न्यूयार्क टाइम्स सन्दर्भ पत्रकारिता का विशिष्ट नमूना है। भारत में नवभारत टाइम्स व हिन्दुस्तान व्यवस्थित व सुगठित संदर्भ सेवा करते हैं। सम्पादकीय, लेखों, समाचारों को पूर्णता प्रदान करने के लिए संदर्भित कतरनों की आवश्यकता पड़ती है। वर्ष भर का विवरण जुटाना भी सन्दर्भ पत्रकारिता के अन्तर्गत आता है। टाइम्स ऑफ इण्डिया वार्षिक, स्टेट्स मैन, ईयरबुक, हिन्दुस्तान समाचार वार्षिकी इसी तरह के संदर्भ ग्रन्थ हैं। कतरनों के अतिरिक्त व्यक्तियों, स्थानों, घटनाओं के चित्र सुरक्षित व क्रमानुसार रखने से आवश्यकता पड़ने पर उनके उपयोग में सुविधा रहती है।

बाल पत्रकारिता :

पण्डित नेहरू की मान्यता थी कि बच्चे ही राष्ट्र का भविष्य हैं। बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में पत्रकारिता की भागीदारी बाल-पत्रकारिता पूरा करती है। बाल सुलभ जिज्ञासा की पूर्ति के लिए यह पत्रकारिता सामग्री जुटाती है। इससे बच्चों के सामान्य ज्ञान की अभिवृद्धि होती है। उनमें साहित्यिक अभिरुचि, कविता, कहानी आदि पढ़ने-लिखने की उद्भावना पुष्ट होती है। पत्रकार बाल मनोविज्ञान के ज्ञान द्वारा ही ऐस पत्रकारिता कर सकते हैं।

हिन्दी पत्रों में बालपत्रकारिता की परम्पर पुरानी है। बालदर्पण, चुन्नमुन, किशोर, बाल मनोरंजन, बालक, खिलौन काफी पुरानी बाल पत्रिकाएं हैं। स्वाधीनता के पश्चात्, चंदा मामा, नंदन, पराग, बाल भारती, बालक, वानर, लोट पोट चम्पक, मेला आदि प्रकाशित हुई। आजकल बालहंस, चाचा चौधरी, पराग, नंदन आदि का प्रकाशन हो रहा है । इन पत्रिकाओं के अतिरिक्त राष्ट्र स्तर के पत्रों में बालकों को पाठ्य सामग्री भी सुन्दर और दिलचस्प बनाकर प्रतिपादित की जाती है।

साहित्यिक पत्रकारिता :

पत्रकारिता और साहित्य दोनों का उद्देश्य समाज का विकास करना है। पत्रकार और साहित्यकार समाज के सजग प्रहरी हैं। पत्रकारिता समय सापेक्ष हैं अर्थात् तात्कालिक संदर्भों को उजागर करना अपना उद्देश्य मानती हैं। साहित्य भी सत्यं शिवं सुन्दरं का प्रतिष्ठापन कर जीवन को सौन्दर्य प्रदान करने में जुटा रहता है। साहित्य जीवन की आलोचना भी है। (Litrature is criticism of life) साहित्य की विभन्न विधाओं, कविता, उपन्यास, नाटक, कहानी आदि में एक कृत्रिम रचना संसार होता है। सत्य और जीते-जागते प्रतीत होने वाले पात्रों के माध्यम से कथा व संदर्भों को प्रस्तुत करने की चेष्टा होती है।

योग्य पत्रकार साहित्यकार भी होता है। साहित्यकार और पत्रकार दोनों ही रचनाकार हैं दोनों की सूक्ष्मदृष्टि, लेखकीय सम्प्रेषणीयता आवश्यक तत्त्व हैं। आधुनिक युग में साहित्यिक क्षुधा की तृप्ति के लिए समाचार-पत्रों में साहित्यिक पृष्ठ निर्धारित होता है। कई साहित्यिक पत्रिकाएं साहित्यिक समाचार यथा- कवि या रचनाकार का सम्मान, कवि सम्मेलन, पुस्तक विमोचन, साहित्य संगोष्ठी आदि के समाचार, समीक्षा आदि प्रकाशित करती है।

वाणिज्यिक पत्रकारिता

राष्ट्र की अर्थव्यवस्था बनाने में औद्योगिक उपक्रमों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों का विशेष योगदान होता हैं वाणिज्य व्यापार सम्बन्धी स्थितियों का आकलन करने के लिए वाणिज्यिक पत्रकारिता का विशेष महत्त्व है। दैनिक पत्रों में भी एक पृष्ठ व्यापार जगत की गतिविधियों पर आधारित होता है जिसमें बाजार भाव, अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक मुद्दों, नए उत्पादनों का परिचय, भावों के उतार-चढाव, मुद्रा विनियम सम्बन्धी रचनाएं होती हैं।

इसके अतिरिक्त खाद्यान्नों सर्राफा बाजार मूल्य आदि भी दैनिक पत्रों में पाये जाते हैं। वाणिज्यिक पत्रकार आर्थिक क्षेत्र का मर्मज्ञ होता है। पत्र-पत्रिकाओं में देश-विदेश की व्यापारिक गतिविधियों का लेखा-जोखा प्रकाशित करना उसी का कार्य है।

शैक्षिक पत्रकारिता:

शिक्षा का जीवन में विशेष महत्त्व है। शिक्षा जगत की विभिन्न समस्याओं, नीतियों, प्रवृत्तियों को प्रकाशित करने के उद्देश्य से शैक्षिक पत्रकारिता की आवश्यकता पड़ी। शिक्षा क्षेत्र के विविध सन्दर्भों जैसे महिला शिक्षा, उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा, बेरोजगारी समस्या, पुस्तकालयों की उपयोगिता आदि सन्दर्भों को भी शैक्षिक पत्रकारिता में लाया जाता है। शिक्षा के विविध आयाम जैसे- पुस्तकालय, शिक्षण तकनीक, छात्रावास, शिक्षक शिष्य सम्बन्ध आदि विषय भी इसी पत्रकारिता के अन्तर्गत आते हैं। शिविर, नई तालीम, भारतीय शिखा, भारती, शिक्षक बंधु शैक्षिक पत्रिकाएं हैं जो इस क्षेत्र में सेवारत हैं।

पर्यावरण पत्रकारिता :

विगत दो-तीन दशकों में पर्यावारण के प्रति समाज की जागरूकता ज्यादा बढ़ी है। वास्तविकता यह है कि कंकरीटनुमा संस्कृति के अन्तर्गत ज्यादा से ज्यादा आवास, उद्योग स्थापित हो रहे हैं और परिस्थितिक संतुलन बिगड़ गया है। ओजोन की सतह टूट रही है, मृदा ही नहीं जल, ध्वनि, वायु प्रदूषण बढ़ रहा है। इसके लिए पर्यावरण संरक्षण नितान्त आवश्यक हो रहा है। अधिक से अधिक पेड़ लगाने, पर्यावरण को हरा-भरा रखने पर बल दिया जा रहा है। यह पत्रकारिता का नया रूप है और इसमें नवागत पत्रकारों की भागीदारी आपेक्षित है।

धार्मिक पत्रकारिता :

‘अध्यात्म गुरु की उपाधि से विभूषित भारत में धर्मों की विविधता है। धार्मिक व आध्यात्मिक पत्र पत्रिकाओं द्वारा समाज में धार्मिक संस्कारों का प्रवर्तन काफी समय से हो रहा है। आर्य मित्र, कल्याण, चिन्मय, अखण्ड ज्योति, जिनवाणी, धर्मदूत, भागवत पत्रिका, अणुव्रत, श्रीकृष्ण संदेश ऐसी ही पत्रकारिता के नमूने हैं। इन पत्र पत्रिकाओं में धर्म और अध्यात्म सम्बन्धी विषयों को प्रकाशित किया जाता है।

अन्तरिक्ष पत्रकारिता :

सूचना संसाधनों को जुटाने में उपग्रहों तथा अन्तरिक्ष का विशेष योगदान रहा है। सच कहा जाये तो उपग्रहों ने सारे विश्व को एक वैश्विक ग्राम (global village) में बदल दिया है। अब दूरभाष व अन्य विद्युतीय संचार माध्यमों द्वारा सेवाएं बढ़ रही हैं। भूस्थिर उपग्रह ने कार्यक्रम प्रसारण का क्षेत्र बढ़ा दिया है। DTH जैसी सुविधा इसी से सम्भव हो सकी है। अनुसंधानों का परिणाम ही है कि दूरस्थ स्थानों की सामग्री का प्रकाशन अब कहीं भी उपलब्ध कराया जा सकता है। अन्तरिक्ष से जुड़े विविध नवीन प्रयोगो, अनुसंधानों पर प्रकाश डालना ही अन्तरिक्ष पत्रकारिता है।

स्वास्थ्य पत्रकारिता :

आज ‘मानव समाज शिक्षित होने की वजह से चिकित्सा और स्वास्थ्य का महत्त्व समझने लगा है। पत्र-पत्रिकाओं में स्वास्थ्य सम्बन्धी पन्ना विशेष सामग्री से भरा पूरा होता है। धन्वतरि, प्राकृतिक जीवन, आपका स्वास्थ्य आदि ऐसी पत्रिकाएं हैं जो स्वतन्त्र रूप से स्वास्थ्य और चिकित्सा जैसे विषय पर आधारित हैं। इनके माध्यम से कई संक्रामक तथा अन्य रोगों का इलाज बताया जाता है। घरेलू उपचार की पद्धतियों पर प्रकाश डाला जाता है।

महिला पत्रिका :

नारी समाज का अविभाज्य अंग है। पुरुष प्रधान समाज में नारी की स्थिति अत्यन्त दयनीय है। विद्रूपस्थितियों से उबारने के लिए जहां सरकार ने दहेज प्रथा उन्मूलन अधिनियम, नारी सुरक्षा अधिनियम, 1 बाल-विवाह निरोधक अधिनियम का निर्माण किया वहां महिला सशक्तीकरण, महिला वर्ष आदि द्वारा भी नारी को बलवती करने की चेष्टाएं की हैं। गृह शोभा, सरिता, गृहलक्ष्मी, वनिता, सरोपमा, जागरणसखी, मेरी सहेली आदि महिला पत्रिकाओं में नारी अस्मिता के विषयों पर विचार प्रस्तुत किए जाते हैं। दैनिक पत्रों में भी महिला विषयक स्तम्भ प्रकाशित किये जाते हैं।

अन्त में, कहा जा सकता है कि पत्रकारिता के इतने विविध प्रकार है कि अब पत्रकारों को विविध विषयों में परांगतया निष्णात होना पड़ेगा। ज्ञापन पत्रकारिता, ब्रेल पत्रकारिता जैसे और भी कई आयाम हैं। आज नव समाज अपना चतुर्दिक विकास करना चाहता है ऐसे वातावरण में त्रकारिता को वैविध्यपूर्ण ढंग से पत्रकारिता करनी पड़ेगी, इसमें तनिक देह नहीं है।

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के प्रकार कितने हैं What are the types of journalism

पत्रकारिता के प्रकार कितने हैं ? पत्रकारिता का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है। जीवन और जगत में जितने भी क्षेत्र बढ़े हैं, उतने ही पत्रकारिता में विविधता आयी है।

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Author: Paramjit Singh

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